31 July 2019 The Hindu Editorial


# महिला सशक्तिकरण का उड़ीसा मॉडल #


The Hindu, 31 July 2019

यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि महिला सशक्तिकरण महत्वपूर्ण विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में मदद करता है। यदि राजनीति में महिलाओं की भागीदारी अधिक है तो लिंग-विशेष नीति और नियोजन पर ध्यान देने के स्तर में वृद्धि होती है। हालांकि वैश्विक औसत की तुलना में भारत में नेतृत्व की भूमिका निभाने वाली महिलाओं की संख्या काफी कम है। 17 वीं लोकसभा में महिला सांसदों के प्रतिनिधित्व में 2014 के 11% से 2019 में 14% तक का सुधार देखा गया है, लेकिन यह अभी भी वैश्विक औसत 24.3% से कम है। 2019 में  715 महिला उम्मीदवारों ने लोकसभा चुनाव लड़ा, जबकि चुनाव लड़ने वाले पुरुषों की संख्या 7,334 थी।

उड़ीसा को देश में अविकसित राज्य के रूप में देखा जाता है और कुछ मानव विकास संकेतकों के मामले में यहाँ पिछड़ापन है। इसके बावजूद भी अन्य राज्य महिला सशक्तिकरण के लिए उड़ीसा सरकार के मॉडल को अपना सकते हैं –

  • बीजू जनता दल (BJD) के नेतृत्व वाली उड़ीसा सरकार, महिलाओं के लिए पंचायती राज संस्थानों में 50% सीटें आरक्षित करने वाली पहली सरकार थी। इसके अलावा, उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने लोकसभा चुनाव में एक तिहाई सीटों के लिए महिलाओं को नामित किया। इस प्रकार, 2019 के चुनाव के लिए पार्टी के लिए 21 में से सात उम्मीदवार महिलाएं थीं। महिला उम्मीदवारों के बीच सफलता की दर पुरुषों की तुलना में अधिक थी, क्योंकि सात महिलाओं में से पांच चुनाव जीत गई।

स्वयं सहायता समूहों की भूमिका  :

महिलाओं को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने के अलावा, बीजद सरकार महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए, उनको स्वयं सहायता समूहों में संगठित कर रही है। अब तक ‘मिशन शक्ति’ कार्यक्रम के तहत ओडिशा में छह लाख स्वयं सहायता समूह हैं जिससे सात लाख महिला जुडी हुई हैं।

  • इस कार्यक्रम का उद्देश्य महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए आय-सृजन की गतिविधियों को शुरू करने में मदद करना है। ये स्वयं सहायता समूह, उड़ीसा आजीविका मिशन और उड़ीसा ग्रामीण विकास और विपणन सोसायटी से जुड़े हैं।
  • स्व-सहायता समूहों के सदस्यों को राज्य में आयोजित मेलों और प्रदर्शनियों में उत्पादों को बेचने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इससे उन्हें राज्य के विभिन्न हिस्सों में यात्रा करने और उपभोक्ताओ तक पहुचने के अधिक अवसर मिलते है।
  • राज्य सरकार ने प्रत्येक स्वयं सहायता समूह के लिए जनवरी 2019 में 3 लाख के ब्याज मुक्त ऋण की घोषणा की थी। आम चुनाव से ठीक पहले यह राशि बढ़ाकर ₹ 5 लाख कर दी गई।
  • महिला और बाल विकास विभाग को महिला और बाल विकास और मिशन शक्ति विभाग के रूप में फिर से पंजीकृत किया गया है।

श्री पटनायक द्वारा एक लोकसभा क्षेत्र के उम्मीदवार के रूप में स्वयं सहायता समूह की नेता प्रमिला बिसोई का नामांकन करवाना कई लोगों के लिए आश्चर्य की बात हो सकती है, लेकिन इसे स्वयं-सहायता समूह के सदस्यों को सार्वजनिक जीवन में सबसे आगे लाने के लिए एक रणनीतिक कदम के रूप में देखा जा सकता है। इस फैसले ने यह संकेत भी दिया कि ग्रामीण महिलाएं राजनीति में उच्च पदों तक पहुंचने की आकांक्षा रख सकती हैं।

प्रोत्साहन एजेंडा :

महिलाओं के विश्वास को जीतने और उन्हें सशक्त बनाने के लिए, नवीन पटनायक सरकार ने महिलाओं को स्मार्टफोन, कार्य अनुबंधों के पुरस्कार और राज्य की स्वास्थ्य बीमा योजना में उच्च प्राथमिकता देने की घोषणा की है, जो राष्ट्रीय स्तर की आयुष्मान भारत योजना से कई गुना बेहतर है । राज्य सरकार ने स्व-सहायता समूहों के सभी सदस्यों के लिए दुर्घटना बीमा योजना की घोषणा की है। यह कोई आश्चर्य नहीं है कि इन सभी सकारात्मक उपायों ने बीजद को अपने पांचवें कार्यकाल के लिए चुनाव जीतने में मदद की है।



# UNSC में अगली पारी के लिए भारत की तैयारी #


The Hindu, 31 July 2019

भारत ने एशिया-प्रशांत क्षेत्र से जापान के अलावा किसी भी अन्य देश की तुलना में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के एक गैर-स्थायी सदस्य के रूप में ज्यादा कार्य किया है। भारतीय कूटनीति के लिए संतोषजनक बात यह है कि समूह ने सर्वसम्मति से इस वर्ष भारत को आठवें द्विबार्षिक कार्यकाल के लिए समर्थन देने का निर्णय लिया हैं। चुनाव अगले साल जून में होने हैं। भारत का चुनाव लगभग सुनिश्चित है और इसका कार्यकाल 2021 से 2022 तक होगा।

तेजी से बदलते समीकरण :

वैश्विक संगठन में शांति और संघर्ष से संबंधित उच्चतम निर्णय लेने वाले अंग में भारत के कार्यकाल के दौरान क्या मुद्दे सामने आएंगे, इसका अनुमान असम्भव है क्योकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति के समीकरण तेजी से बदल रहे है।

सोवियत संघ के विघटन के बाद वाशिंगटन-सहमति (Washington consensus) तीन कारकों के मद्देनजर संकटग्रस्त है:

  1. प्रमुख शक्तियों के बीच तनाव;
  2. पश्चिम एशिया में छद्म युद्ध, और
  3. संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा धमकी और आर्थिक प्रतिबंधों का व्यापक और डरावना प्रयोग,

चीन की वृद्धि और रूसी आक्रामकता का अमेरिका द्वारा सैन्य और आर्थिक उपायों के माध्यम से विरोध किया जाता है, अनिच्छा से ही सही यूरोपीय सहयोगियों और अन्य देशो द्वारा इसका समर्थन किया जाता है। यह रणनीतिक दौड़ कृत्रिम बुद्धिमत्ता, 5G जैसी उच्च प्रौद्योगिकी में वर्चस्व के लिए है, जिनका भविष्य के दशकों में रणनीतिक महत्व होगा। बड़ी और मध्यम शक्तियों के बीच अधिक प्रभाव के लिए निरंतर तनातनी चलती रहेगी और रणनीतिक स्वायत्तता और समानता जैसी अवधारणाओं के लिए बहस प्रमुख शक्तियों के बीच बढ़ते ध्रुवीकरण के साथ सिकुड़ गई है, फिर भी कुछ स्थिरांक उम्मीद के किरण बने हुए हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प फिर से चुने जाएँ या नहीं,  ’अमेरिका फर्स्ट’ सिद्धांत किसी न किसी रूप में तब तक रहेगा जब तक कि इसे देश के बड़े मतदाता वर्ग का समर्थन मिलता रहेगा। इससे अमेरिकी विदेश नीति अधिक सौदेबाजी वाली बनती है जो संयुक्त राष्ट्र के भीतर सुधार प्रक्रिया और UNSC की स्थायी सदस्यता में विस्तार के लिए कम रूचि दिखाएगी।

भारत एक गैर-स्थायी सदस्य के रूप में अपनी सदस्यता का उपयोग अपनी छवि को अंतरराष्ट्रीय समाज पटल पर एक रचनात्मक और जिम्मेदार सदस्य के रूप में गढ़ने के लिए कर सकता है,  लेकिन इसके लिए इंतजार करना होगा।  निम्न विषय भारत की प्राथमिकता में हो सकते हैं – G-4 (भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील) को यूएनएससी में शामिल करना, भारत को औपचारिक पैकेज प्रदान करना , पश्चिम बनाम शेष विश्व मामलों के पक्ष में अधिक संतुलन पैदा करना।

भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। तदनुसार, इसकी आवाज दुनिया को सुरक्षित बनाने के लिए  बहुपक्षवाद पर जोर देने और उसे मजबूत करने के लिए अपने कार्यकाल के दौरान एक महत्वपूर्ण योगदान देने में सक्षम हो सकती है।

बहुध्रुवीय फोकस :

  • भारत को एक बहुध्रुवीय दुनिया के उद्देश्य को बनाए रखने और एकपक्षीयता, जातीय-केन्द्रवाद, संरक्षणवाद और नस्लीय असहिष्णुता के प्रति मौजूदा रुझान का मुकाबला करने की आवश्यकता है।
  • विश्व व्यापार संगठन के विवाद निपटान तंत्र को अमेरिकी प्रयासों से बचाने की कोशिश करनी चाहिए।
  • संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद आदि विकासशील देशों के लिए काफी महत्व रखते है। संयुक्त राष्ट्र के समर्थन के बावजूद अमेरिका और कुछ अन्य देश इनसे समर्थन वापस ले रहे हैं।
  • भारत को सामूहिक विनाश के हथियारों के गैर-भेदभावपूर्ण उन्मूलन, ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ पर्यावरण की सुरक्षा, अन्तरिक्ष के हथियारकरण से रक्षा और विश्व राजनीति में विविधता और बहुलता के लिए सम्मान बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए।
  • भारत को संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2 की वैधता को रेखांकित करना चाहिए जो राज्य संप्रभुता और सुरक्षा उपायों के लिए अन्य राज्यों के घरेलू मामलों में बाहरी हस्तक्षेप के खिलाफ बल प्रदान करता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय समाज में एक नियम-आधारित व्यवस्था को बनाए रखने के लिए, भारत को सुरक्षा परिषद और जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते, ईरान के साथ बहुपक्षीय समझौते जैसी संधियों की पवित्रता को रेखांकित करना चाहिए।
  • देश-विशिष्ट विषयों के यूएनएससी के समक्ष फिर से प्रकट होने की संभावना है, जैसे कि – साइप्रस, फिलिस्तीन, यूक्रेन और उत्तर कोरिया के विवाद। इनमें से प्रत्येक पर भारत ने एक संतुलित स्थिति रखी है जिनकी समीक्षा करने की आवश्यकता है।
  • कश्मीर संयुक्त राष्ट्र के एजेंडे में है और अगर कश्मीर घाटी में हालात बिगड़ते हैं तो इस मुद्दे को पाकिस्तान द्वारा UNSC में पुनर्जीवित किया जा सकता है, हालांकि तीसरे पक्ष को भारत-पाकिस्तान विवादों में खुद को शामिल करने का कोई उत्साह नहीं है।
  • यदि रिपोर्ट्स सच हैं कि श्री मोदी इस कार्यकाल के दौरान चीन के साथ संबंधों को सामान्य बनाने की कोशिश कर सकते हैं तो यह भारत की स्थिति को बहुत मजबूत करेगा।

पाकिस्तान और आतंकी कोण :

चीन ने उइगरों के संबंध में क्या खोया हैं, इसके विश्लेषण से साबित हो जाता हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था और लोकतांत्रिक प्रणाली हमारे लिए सर्वोत्तम बीमा पॉलिसी साबित हुई है । असंतुष्ट लोगो को भी स्थानीय समाधान के रूप में रौशनी दिखाई देनी चाहिए ।

पाकिस्तान के साथ भारत का विवाद सीमा पार आतंकवाद को लेकर है। संयुक्त राष्ट्र की समितियों में आतंकवाद के खिलाफ एक अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन के सवाल पर कई वर्षों से चर्चा चल रही है । भारत, पाकिस्तान स्थित आतंकवादी समूहों और व्यक्तियों पर मुकदमा चलाने के लिए UNSC की प्रतिबंध उपसमिति में अपनी उपस्थिति का उपयोग कर सकता है, लेकिन अनुभव से पता चलता है कि यह स्पष्ट रूप से एक संदिग्ध प्रकार का लाभ है ।

भारत अगले कुछ वर्षों में महसूस करेगा कि विश्व मंच पर एक प्रमुख भूमिका निभाने के लिए उसका समय आ गया है, हालाकि दक्षिण एशियाई क्षेत्र में भारत के लिए शक्ति संतुलन की स्थिति मुश्किल होगी। दरअसल भारत की क्षेत्रीय स्थिति पर्याप्त रूप से विश्वसनीय नहीं है। इसलिए यूएनएससी के समक्ष सभी मुद्दों पर भारत को अध्ययन करना चाहिए कि वे भारतीय उपमहाद्वीप पर कैसे प्रभाव डालेंगे।

निष्कर्ष :

चौथी शताब्दी ईसा पूर्व एथेंस में डिमास्थेनीज़ ने कहा कि “राजनयिकों के पास संकट से निपटने के लिए कोई युद्धपोत नही है उनके हथियार शब्द और अवसर हैं“। UNSC में भारत की उपस्थिति देश की प्रतिष्ठा बढ़ाने का अवसर प्रस्तुत करेगी। भारत के पडोसी देशो में पश्चिम एशिया, रूस और चीन के प्रति अमेरिकी नीतियाँ ऐसी चुनौतियाँ पेश करती हैं जिन्हें केवल महान कौशल और संतुलन के साथ ही संभाला जा सकता है। भारत को अपनी योग्यता और नियम-आधारित निर्णयों के साथ परिषद में अपने आठवें कार्यकाल को पूरा करने का लक्ष्य बनाकर आगे बढ़ना चाहिए ।