30 July 2019 Current Affairs


सामान्य अध्ययन III 

समावेशी विकास तथा इससे उत्पन्न विषय (Inclusive growth and issues arising from it)


# ऑटोमेशन और बेरोजगारी #

हाल ही में वैश्विक आबादी पर संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2027 तक भारत की आबादी 150 करोड़ हो जाएगी जो विश्व में सर्वाधिक होगी। वर्तमान में भारत की कुल आबादी 137 करोड़ है, वहीं चीन की आबादी 143 करोड़ है । इस तरह भारत 2027 तक चीन को पछाड़ कर विश्व की सर्वाधिक आबादी वाला देश बन जायेगा। उल्लेखनीय है कि भारत में जिस गति से आबादी में इजाफा हुआ है, उसी गति से बेरोजगारी में भी वृद्धि हुई है। उपरोक्त आंकड़ें चिंताजनक हैं और जनसंख्या के भारी दबाव के कारण गरीबी, बेरोजगारी, स्वास्थ्य, कुपोषण , खाद्यान्न की कमी के परिणामस्वरूप विभिन्न समस्याएं उठ खड़ी होगी ।

उल्लेखनीय है कि वर्तमान में भारत सहित वैश्विक परिदृश्य में डिजिटल प्रौद्योगिकी पर ध्यान दिया जा रहा है अर्थात् चौथी औद्योगिक क्रांति का आधार डिजिटल प्रौद्योगिकी ही है। वर्ल्ड रोबोट स्टेटिस्टिक्स के अनुसार, विश्व भर में रोबोट का सबसे बड़ा ग्राहक ऑटोमोटिव इंडस्ट्री है। अकेले 2016 में रोबोट की कुल सप्लाई का 35 फीसदी हिस्सा ऑटोमोटिव सेक्टर में किया गया। भारत में  2016 तक मारुति उद्योग हरियाणा में 1100 रोबोट, फोर्ड के गुजरात प्लांट में 90 फीसदी काम ऑटोमेटेड होता है, जो 453 रोबोट करते हैं।

अगले दो दशक में विश्व की अर्थव्यवस्था का 50 फीसदी ऑटोमेशन से प्रभावित होगा। इसका अर्थ यह कि 120 करोड़ श्रमिक प्रभावित होंगे, जिनमें से आधे चीन, भारत, जापान व अमेरिका के होंगे। वहीं विकसित देशों के मुकाबले विकासशील देशों में नौकरियों पर ऑटोमेशन का खतरा ज्यादा है। विश्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि भारत की आईटी इंडस्ट्री में 69 प्रतिशत नौकरियों पर ऑटोमेशन का खतरा मंडरा रहा है। भारत के मुकाबले चीन में 77 प्रतिशत नौकरियां ऑटोमेशन की वजह से खतरे में हैं। 1991 से 2013 के बीच भारत में करीब 30 करोड़ लोगों को नौकरी की जरूरत थी जबकि केवल 14 करोड़ लोगों को ही रोजगार मिल सका।

ऐसे में भारत की बढ़ती आबादी के लिए ऑटोमेशन एक समस्या होगी क्योंकि इसकी वजह से लोगों की नौकरी जा सकती है। भारत  में पहले से ही बेरोजगारी एक प्रमुख चिंता का विषय बना हुआ है। इस तरफ तत्काल नीति-निर्माताओं को ध्यान देना चाहिये।

रोबोट की वजह से मानव श्रम को होने वाले नुकसान को लेकर दुनिया में बहस शुरू हो चुकी है। इसी के परिणाम स्वरूप फरवरी 2018 में यूरोपीय सांसदों ने यूरोपीय संघ के समक्ष एक कानून बनाने का प्रस्ताव रखा जो रोबोट के बढ़ते प्रचलन का नियमन करे। फ्रेंकफर्ट स्थित इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रोबोटिक्स ने एक बयान जारी कर कहा कि रोबोट टैक्स लगने से प्रतिस्पर्धा और रोजगार पर नकारात्मक असर पड़ेगा। हालांकि दुनिया के सबसे अमीर उद्योगपति बिल गेट्स का मानना है कि उन कंपनियों पर टैक्स लगना चाहिए, जो रोबोट का इस्तेमाल करेंगी। इससे कंपनियों में रोबोट के इस्तेमाल को लागू होने की गति को धीमा किया जा सकता है।

कुल मिलाकर ऑटोमेशन जहां मानव श्रम को नुकसान पहुँचाता है, वहीं वर्तमान में इसे एक जरूरत भी समझी जा रही है क्योंकि भारत ही नहीं बल्कि विश्व भर में इसकी जरूरत महसूस की जा रही है। भारत में इसकी संभावनाएँ चिकित्सा क्षेत्र में आवश्यकता के अनुरूप है।

सामान्य रूप से माना जाता है कि ऑटोमोशन और रोबोट रोजगार के अवसरों को कम करते हैं। ऐसी धारणा से पहले इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि हाल के कुछ दशकों में किस प्रकार श्रम में परिवर्तन हुए हैं और कैसे श्रम प्रणाली अनुचित माध्यमों या शोषण पर आधारित हो गई है। इसके मूल्यांकन के बाद ही हम विचार कर सकेंगे कि श्रम प्रणाली की खमियों को दूर करने में रोबोट किस प्रकार मददगार हो सकती है। सच तो यह है कि अगर रोबोट क्रांति को ठीक से उपयोग में लाया जा सके तो लंबे समय से हो रहे श्रमिकों के शोषण को खत्म किया जा सकता है।


सामान्य अध्ययन III 

स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय। Issues relating to development and management of Social Sector/Services relating to Health, Education, Human Resources.


# नीति आयोग हेल्थ इंडेक्स, 2019 #

हाल ही में नीति आयोग द्वारा हेल्थ इंडेक्स, 2019 जारी किया गया। इसका शीर्षक ‘स्वस्थ राज्य, प्रगतिशील भारतः राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रें की रैंक पर रिपोर्ट’ (Healthy States, Progressive India : Report on Rank of States and UTs) है। इस इंडेक्स के अनुसार, कुछ राज्य और केंद्रशासित प्रदेश कम संसाधन के साथ स्वास्थ्य और कल्याण के मानक पर बेहतर काम कर रहे हैं, जबकि अन्य उच्च संसाधन के साथ भी सुधार नहीं कर पा रहे हैं। 2017-18 के दौरान मूल्यांकन में कुछ बड़े राज्यों ने एक निराशाजनक तस्वीर पेश की, जिसमें उनकी सरकारों ने स्वास्थ्य और मानव विकास के लिए कम प्राथमिकता को दर्शाया है।

सर्वाधिक आबादी वाला राज्य उत्तर प्रदेश 28.61 के कम स्कोर के साथ समग्र स्वास्थ्य सूचकांक में काफी पीछे है, जबकि  केरल ने सबसे अधिक  74.01 स्कोर किया है। आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र, क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं, वहीं गुजरात, पंजाब और हिमाचल प्रदेश क्रमशः चौथे, पाँचवें और छठे स्थान पर रहे। केरल, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र स्वास्थ्य संकेतकों में ऐतिहासिक प्रदर्शन के आधार पर शीर्ष रैंकिंग वाले राज्यों के रूप में उभरे हैं।

यह सूचकांक 23 संकेतकों पर आधारित है, जो नवजात शिशु और शिशु मृत्यु दर, प्रजनन दर, जन्म के समय कम वजन, टीकाकरण कवरेज, तपेदिक और एचआईवी के इलाज में प्रगति जैसे पहलुओं को कवर करता है। इसमें राज्यों के प्रशासनिक क्षमता और सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे में सुधार का भी मूल्यांकन किया जाता है।

निष्कर्षः

राज्यों के स्वास्थ्य सूचकांक में सुधार हेतु सार्वजनिक स्वास्थ्य को राजनीति के मुख्यधारा का हिस्सा बनना चाहिए। इतने दशकों के बाद भी ऐसे विश्वसनीय प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल की उपेक्षा बिहार जैसे राज्यों को प्रभावित करती है, जहाँ शिशु और नवजात मृत्यु दर और जन्म के समय कम वजन के बच्चों की देखभाल, तथा जिला अस्पतालों में विशेषज्ञ विभाग बनाने की आवश्यकता है। नीति आयोग के आकलन के अनुसार, ओडिशा, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, असम और झारखंड में प्राथमिक स्वास्थय देखभाल केन्द्रों पर विशेष निगरानी करने की आवश्यकता है।


सामान्य अध्ययन III 

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ; देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास और नई प्रौद्योगिकी का विकास। Achievements of Indians in Science & Technology; indigenization of technology and developing new technology. 


# वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था और भारत #

1960 के दशक की शुरूआत से, भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में लगातार वृद्धि हुई है, जिससे महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ मिली हैं। इनमें उपग्रहों का निर्माण, अंतरिक्ष में प्रक्षेपण करने वाले वाहन और संबंधित क्षमताओं की एक वृहद श्रृंखला शामिल हैं।

आज, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) का वार्षिक बजट 10,000 करोड़ का हो गया है जो पिछले पांच साल पहले 6000 करोड़ था। हालांकि, इसरो के आपूर्ति की तुलना में भारत में अंतरिक्ष-आधारित सेवाओं की मांग कहीं अधिक है। निजी क्षेत्र का निवेश महत्त्वपूर्ण है, जिसके लिए एक उपयुक्त नीति तैयार करने की आवश्यकता है।

वर्तमान में एक बढ़ती हुई प्रवृत्ति यह है कि अंतरिक्ष क्षेत्र के समग्र विकास को सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय कानून बनाने की आवश्यकता है। 2017 में पेश किए गए स्पेस एक्टिविटी विधेयक को  समाप्त कर दिया गया, हालाँकि सरकार के पास अब एक नए विधेयक को प्राथमिकता देने का अवसर है, जिसका निजी क्षेत्र  और स्टार्ट-अप  द्वारा समान रूप से स्वागत किया जा सकता है।

इसरो का प्रदर्शन

1969 में अपनी स्थापना के बाद से ही इसरो को सामाजिक उद्देश्यों और रोमांचक मिशन को कवर करने के लिए निर्देशित किया गया है। इसका पहला क्षेत्र दूरसंचार, प्रसारण और ब्रॉडबैंड जैसे बुनियादी ढांचे के लिए राष्ट्रीय आवश्यकताओं को शामिल करने के लिए इनसैट और जीसैट के साथ उपग्रह संचार का था।

इसरो द्वारा बड़े उपग्रहों को वृहद पैमाने पर ट्रांसपोंडर ले जाने के लिए बनाया गया। भारतीय उपग्रहों पर लगभग 200 ट्रांसपोंडर दूरसंचार, टेलीमेडिसिन, टेलीविजन, ब्रॉडबैंड, रेडियो, आपदा प्रबंधन और खोज एवं बचाव जैसे क्षेत्रें से जुड़ी सेवाएं प्रदान करते हैं।

ये संसाधन कृषि और वाटरशेड, भूमि संसाधन तथा वानिकी प्रबंधन को कवर करते हैं। उच्च रिजॉल्यूशन और सटीक स्थिति के साथ, भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) के अनुप्रयोग आज ग्रामीण एवं शहरी विकास योजनाओं के सभी पहलुओं को कवर करते हैं। 1980 के दशक में भारतीय रिमोट सेंसिंग (IRS) श्रृखंला के साथ शुरूआत करते हुए, आज रिसैट (RISAT), कार्टोसैट और रिसोर्ससैट श्रृखंला  सहित भूमि, महासागर और वायुमंडल के लिए व्यापक क्षेत्र तथा बहु-वर्णक्रमीय उच्च रिजॉल्यूशन डेटा प्रदान करते हैं।

बढ़ते आत्मविश्वास के साथ, इसरो ने अधिक महत्त्वाकांक्षी अंतरिक्ष विज्ञान और अन्वेषण मिशनों को भी शुरू किया है। इनमें से सबसे उल्लेखनीय चंद्रयान और मंगलयान मिशन हैं। जबकिं गगनयान एक मानवयुत्तफ़ अंतरिक्ष मिशन है, जिसका पहला परीक्षण  2021 में  किया जायेगा। ये मिशन केवल प्रौद्योगिकी प्रदर्शन के लिए ही नहीं, बल्कि अंतरिक्ष विज्ञान में तकनीक की सीमाओं का विस्तार करने के लिए भी किया जाएगा।

आज वैश्विक अंतरिक्ष उद्योग का मूल्य $ 350 बिलियन है और 2025 तक 550 बिलियन डॉलर से अधिक होने की संभावना है। इसरो की प्रभावशाली क्षमताओं के बावजूद, भारत का हिस्सा 7 बिलियन डॉलर (वैश्विक बाजार का सिर्फ 2%) है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और बड़े डेटा एनालिटिक्स के विकास के कारण ‘न्यू स्पेस’ का उदय हुआ है।  नई अंतरिक्ष उद्यमिता भारत में लगभग दो दर्जन स्टार्ट-अप के साथ उभरी है।


सामान्य अध्ययन III 

बुनियादी ढाँचाः ऊर्जा, बंदरगाह, सड़क, विमानपत्तन, रेलवे आदि। (Infrastructure: Energy, Ports, Roads, Airports, Railways etc.


# भारतमाला चरण II #

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2019-20 के बजट भाषण में राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना (एनएचडीपी) द्वारा मौजूदा राजमार्गों को चौड़ा और उन्नत करने के लिए भारतमाला-2 की घोषणा की। भारतमाला-2 के तहत केन्द्र सरकार प्रादेशिक राजमार्गो के विकास को बढ़ावा देगी। इसके साथ ही आंतरिक व वैदेशिक व्यापार को बढ़ावा देने वाले ढांचे के विकास के लिए समुद्री व अंतर्देशीय जलमार्गों के विकास को बढ़ावा दिया जाएगा, ताकि परिवहन लागत में कमी के जरिये भारतीय उत्पादों की लागत को कम किया जा सके। यह योजना सड़क परिवाहन और राजमार्ग मंत्रलय की है।

महत्त्वपूर्ण तथ्यः-

  • भारत सरकार द्वारा राज्यों को भारतमाला चरण-2 के तहत राज्यों में सड़कों को बिछाने के लिए निधि प्रदान करेगी। इसका लक्ष्य 2024 तक भारत में 48,000 किलोमीटर नेटवर्क बिछाने की परिकल्पना है।
  • वित्त मंत्री ने बजट पेश करते समय राजमार्ग, रेलवे और जलमार्ग पर विशेष जोर दी। उनके अनुसार ये ‘‘अर्थव्यवस्था के जीवनवृत्त’’ के रूप में हैं। उन्होंने अपने भाषण के दौरान ‘‘ कनेक्टिविटी एक अर्थव्यवस्था का जीवन है कहा।
  • इस बजट में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रलय के लिए आवंटन बढ़ाकर 83,016 करोड़ रुपये कर दिया है, जबकि 2018-19 में 71,000 करोड़ रुपये था।
  • वित्त मंत्री के अनुसार, भारतमाला के महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रम से राष्ट्रीय सड़क गलियारों और राजमार्गों को विकसित करने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि इन पहलों से परिवहन लागत कम होगी और घरेलू रूप से उत्पादित वस्तुओं की प्रतिस्पर्धात्मकता बढे़गा।
  • वित्त  मंत्रलय के अधिकारियों के अनुसार, दूसरे चरण में भारतमाला परियोजना को क्रियान्वित करने की नई योजना के तहत, राज्यों को भूमि के अधिग्रहण और सड़कों के लिए अपेक्षित धनराशि दी जाएगी।
  • बजट में, यह भी उल्लेख किया गया कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने एक रोल ऑपरेट और ट्रांसफर लेन-देन भी किया हैं। इन उपकरणों और मॉडल के माध्यम से संचयी संसाधन 24,000 करोड़ रुपये से अधिक हैं।
  • वित्त मंत्री के अनुसार, भारतमाला के चरण-1 को पूरा करने के बाद दूसरे चरण में राज्यों को राज्य सड़क नेटवर्क विकसित करने में मद्द की जायेगी।

भारतमाला परियोजना:-

  • भारतमाला प्रोजेक्ट भारत सरकार के सड़क परिवहन का एक मेगा प्लान है। यह सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रलय के तहत एक अम्ब्रेला परियोजना है।
  • यह परियोजना सीमा और अन्तर्राष्ट्रीय संपर्क सड़कों तटीय और बंदरगाह कनेक्टिविटी सड़कों के विकास, राष्ट्रीय गलियारों, आर्थिक गलियारों और अन्य लोगों की दक्षता में सुधार पर केन्द्रित थी।

परिणाम:-

  • राष्टीय राजमार्ग विकास परियोजना (एनएचडीपी) संभावित रूप से 10 मिलियन रोजगार पैदा कर सकती हैं।
  • महत्त्वाकांक्षी परियोजना में नए औद्योगिक गलियारे और शहरी केन्द्र बनाने की योजना है, जो देश में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ा सकता है।
  • सरकार के मुताबिक, माल ढुलाई का 70-80 प्रतिशत राष्ट्रीय राजमार्गों पर वाहन चलने की उम्मीद जगायी जा रही हैं।

चुनौतियाँ:-

  • भूमि अधिग्रहण, धन की समस्या इत्यादि का सामना सरकार को करनी पड़ सकती हैं।
  • यह योजना सरकारी फंडिंग पर अधिक निर्भर करती है, और कुल निवेश का 15 फीसदी निजी क्षेत्र से अपेक्षित है।

समाधान:-

  • अनुमोदन की प्रक्रिया को तेज करने के लिए, सरकार ने पहले  ही सभी इंजीनियरिंग, खरीद और निर्माण परियोजनाओं को मंजूरी देने के लिए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को सशक्त बनाया है।
  • सरकार को समय पर योजना पूरा करने में, फंड जुटाने और भूमि अधिग्रहण के रूप में अन्य अड़चनों से निजात पाने के लिए एक निश्चित रोडमैप तैयार करना होगा।

सागरमाला परियोजनाः

  • बजट भाषण में सागरमाला की भी चर्चा की गई। वित्त मंत्री के अनुसार, सागरमाला के तहत प्रमुख राजमार्ग बंदरगाह से जुड़ जाएंगे।
  • बंदरगाहों का आधुनिकीकरण होगा तथा उनसे संबंधित उद्योगों के विकास को बढ़ावा मिलेगा।
  • सागरमाला का उद्देश्य  जल परिवहन के जरिए विदेश व्यापार के ढाँचे में सुधार लाना है।
  • राष्ट्रीय जलमार्गों के परिवहन योग्य बनाने के लिए चलाई गई जलमार्ग विकास परियोजना से अंतर्देशीय जलमार्गों के जरिए आंतरिक व्यापार को बढ़ावा मिलेगा। इनके जरिए वस्तुओं को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना सस्ता और सुगम हो जाएगा, जिससे अंतः स्वदेशी उत्पादित सामानों की लागत घटेगी और निर्यात बढे़गी।
  • यह योजना ‘जहाजरानी मंत्रलय’ की है।

 


# राष्ट्रीय क्रेच योजना #

संदर्भ:

राष्ट्रीय क्रेच योजना को 01 जनवरी 2017 से राज्यों / केंद्र शासित प्रदेशों के माध्यम से केंद्र प्रायोजित योजना के रूप में कार्यान्वित किया जा रहा है।

राष्ट्रीय क्रेच योजना के बारे में:

  • यह योजना महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा कार्यान्वित की जा रही है।
  • यह एक केंद्र प्रायोजित योजना है।
  • इसका उद्देश्य माताओं को काम पर रहने के दौरान बच्चों को छोड़ने के लिए एक सुरक्षित स्थान प्रदान करना है, और इस प्रकार यह महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए एक उपाय है क्योंकि यह उन्हें रोजगार को जारी रखने में सक्षम बनाता है।
  • यह 6 महीने से लेकर 6 साल तक के बच्चों के संरक्षण और विकास के लिए अपनाया गया एक मजबूत सरकारी प्रयास है।

क्रेच योजना की विशेषताएं:

  • यह कामकाजी माताओं के बच्चों को कार्यस्थल पर देखभाल की सुविधा प्रदान करती है।
  • यह योजना निम्न सुविधाए प्रदान करती हैं – पूरक पोषण प्रदान करना, स्वास्थ्य देखभाल जैसे कि- टीकाकरण, पोलियो ड्रॉप्स, बुनियादी स्वास्थ्य निगरानी, ​​नींद की सुविधा, 3 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए प्रारम्भिक प्रेणना, पूर्व-विद्यालय शिक्षा आदि ।

क्रेच योजना का महत्व:

  • यह योजना माता-पिता को कार्यस्थल पर अपने बच्चों को छोड़ने में सक्षम बनाती है , जहां बच्चों को उनके समग्र विकास के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान किया जाता है।
  • यह योजना बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण की स्थिति में सुधार लाना सुनिश्चित करती है।
  • यह बच्चों के शारीरिक, सामाजिक, संज्ञानात्मक और भावनात्मक / समग्र विकास को बढ़ावा देता है।
  • यह बेहतर बाल देखभाल के लिए माता-पिता और देखभाल करने वालों को शिक्षित और सशक्त बनाती है।
  • इस योजना को भारत सरकार, कार्यान्वयन एजेंसियों और गैर सरकारी संगठनों के बीच संरचित करके संवर्धित वित्तीय मानदंडों, कड़े निगरानी और साझा पैटर्न के साथ संशोधित किया जा रहा है।

पात्रता मापदंड:

बाल कल्याण विभाग के रिकॉर्ड में बेहतर प्रदर्शन करने वाली और स्वच्छ छवि वाली स्वैच्छिक संस्थाएं, जो सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के तहत पंजीकृत हों या कम से कम पिछले 2 वर्षों से सार्वजनिक ट्रस्ट के रूप में पंजीकृत हों, इस योजना के तहत प्रोत्साहन निधि प्राप्त करने के लिए पात्र हैं ।

फंड शेयरिंग:

केंद्र, राज्यों / केंद्र शासित प्रदेशों और गैर सरकारी संगठनों / स्वैच्छिक संगठनों के बीच फंड शेयरिंग पैटर्न  60:30:10 के अनुपात में है जबकि  उत्तर पूर्व राज्यों  और हिमालयी राज्यों के लिए 80:10:10 एवं केंद्र शासित प्रदेशो के लिए 90: 0: 10 है।

केंद्र को राष्ट्रीय क्रेच योजना में अधिक निवेश क्यों करना चाहिए?

एक बच्चे का शारीरिक और संज्ञानात्मक विकास गर्भ में शुरू होता है और अपने व्यक्तित्व का 90% वह तीन साल का होने से पहले विकसित करता है। इसलिए जरुरी है कि इस अवधि में अच्छा पोषण और देखभाल उस बच्चे को प्राप्त होना चाहिए।


# रेशम क्षेत्र समग्र योजना #

(रेशम उद्योग के विकास के लिए एक एकीकृत योजना [ISDSI])

संदर्भ:  

देश के प्रमुख रेशम उत्पादक राज्यों में अपना स्थान बनाने वाले तमिलनाडु  को सिल्क समग्र योजना के तहत लगभग 6.22 करोड़ रुपये मिलेंगे ।

सिल्क समग्र के बारे में:

यह योजना केंद्रीय रेशम बोर्ड द्वारा शुरू की गई है।

इस योजना में चार प्रमुख घटक शामिल हैं –

  1. अनुसंधान और विकास, प्रशिक्षण, प्रौद्योगिकी और सूचना प्रौद्योगिकी पहल का स्थानांतरण,
  2. बीज संगठन,
  3. समन्वय और बाजार विकास और
  4. गुणवत्ता प्रमाणन प्रणाली (QCS) / निर्यात ब्रांड संवर्धन और प्रौद्योगिकी उन्नयन।

योजना का मुख्य उद्देश्य –

  • ब्रीडर्स स्टॉक को बनाए रखना,
  • अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं के माध्यम से नस्ल सुधार,
  • यंत्रीकृत प्रथाओं का विकास,
  • सेरीकल्चर सूचना लिंकेज और नॉलेज सिस्टम (एसआईएलकेएस) पोर्टल के माध्यम से प्रौद्योगिकी लाभ,
  • विभिन्न हितधारकों के लिए मोबाइल एप्लिकेशन,
  • बीज की गुणवत्ता की निगरानी

“सिल्क समग्र” योजना का मुख्य उद्देश्य देश में सेरीकल्चर की विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से महिलाओं सहित दलित, गरीब , पिछड़े और आदिवासी परिवारों को सशक्त बनाना है।

भारत में सेरीकल्चर:

  • सेरीकल्चर कृषि आधारित कुटीर उद्योग है, जिसमें ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में भारी रोजगार और आय की संभावनाएं हैं।
  • यह अनुमान लगाया जाता है कि मार्च 2019 तक देश में ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में लगभग 91.20 लाख व्यक्तियों (तमिलनाडु राज्य के 3.40 लाख लोगों सहित) को इस क्षेत्र में रोजगार मिल रहा था।
  • इनमें से बड़ी संख्या में श्रमिक महिलाओं सहित समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लोग हैं। यह मुख्य रूप से सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन और राज्य / केंद्र सरकार द्वारा किए गए प्रयासों के कारण संभव हुआ है।

मुख्य तथ्य:

  • भारत, चीन के बाद दुनिया में रेशम का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है।
  • भारत दुनिया में रेशम का सबसे बड़ा उपभोक्ता है।
  • भारत दुनिया का एकमात्र देश है जो वाणिज्यिक पैमाने पर रेशम की सभी 5 किस्मों- शहतूत, ओक टसर और उष्णकटिबंधीय टसर, मुगा और ईरी का उत्पादन करता है।
  • विश्व प्रसिद्ध ‘मुगा’ रेशम के उत्पादन के क्षेत्र में भारत का विश्व में एकाधिकार है।

# एकीकृत युद्ध समूह  (Integrated Battle Groups) #

(IBG)

संदर्भ:  

सरकार ने अगले महीने के अंत तक सेना के पहले एकीकृत युद्ध समूह को संरचित करने की घोषणा की है।

IBG संरचना और कार्यप्रणाली :

  • IBG अधिक फुर्तीले और आत्मनिर्भर युद्ध में सक्षम होंगे जो शत्रु के खिलाफ तेजी से हमले शुरू कर सकते हैं।
  • प्रत्येक IBG को थ्रेट (threat), टेरेन (Terrain) और टास्क (Task) के आधार पर डिजाईन किया जाएगा और इन्हे वित्तीय संसाधन तीन Ts के आधार पर आवंटित किए जायेंगे।
  • उनका भार हल्का करने की आवश्यकता है ताकि वे रसद जैसी चीजो के कारण अपनी दक्षता कम नही कर बैठे। इसी प्रकार की व्यवस्था से वे 12-48 घंटे के भीतर एकजुट होने में सक्षम होंगे।
  • पाकिस्तान सीमा पर रेगिस्तान में संचालित आईबीजी को पहाड़ों में संचालित आईबीजी से अलग तरीके से गठित किया जाएगा और उसे इसी अनुरूप प्रशिक्षित भी किया जाएगा।
  • आईबीजी रक्षात्मक और आक्रामक दोनों भूमिका निभाएगा। आईबीजी की संरचना को दोनों तरीके से प्रबंधित किया जाएगा । जहाँ रक्षात्मक आईबीजी दुश्मन की कार्रवाई की संभावना वाले क्षेत्रो में कार्य करेंगे । वही आक्रामक आईबीजी तेजी से जुटेंगे और हमले के लिए दुश्मन के इलाके में घुस जायेंगे।

महत्व :

पाकिस्तान सीमा पर कई बार पाकिस्तानी आक्रामक दस्ते (BAT) ने निंदनीय आक्रामक हरकत करते हुए भारतीय गश्ती सैन्य दल के शरीरो को क्षत-विक्षत कर दिया था। उसी समय से भारत भी आक्रामक और रक्षात्मक दोनों क्षेत्रो में इस तरह के दस्तो के निर्माण की सोच रहा था। इस व्यवस्था से सीमावर्ती क्षेत्रो में पाकिस्तान के दुस्साहस को रोकने में मदद मिलेगी।


# वायु प्रदूषण पर अल-नीनो और अंटार्कटिक दोलन के प्रभाव #

संदर्भ :  

चीन और अमेरिका के विभिन्न संस्थानों से जुड़े शोधकर्ताओं ने पता लगाया है कि उत्तरी भारत में वायु प्रदूषण के स्तर को कम करने के लिए अल-नीनो और अंटार्कटिक दोलन की घटनाओं से जुड़े डेटा का उपयोग किया जा सकता है।

पृष्ठभूमि:

हाल के वर्षों में उत्तरी भारत में खराब वायु गुणवत्ता का अनुभव किया गया है । विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ो के अनुसार सर्दियों के महीनों में दुनिया में सबसे खराब वायु गुणवत्ता भारत में देखी गई हैं । शोधकर्ताओं ने पाया है कि पिछले कुछ वर्षों  से मौसम आधारित प्रदूषण निरंतर रूप से गंभीर होता जा रहा हैं ।

मुख्य निष्कर्ष :

  • अल-नीनो उत्तरी क्षेत्र के भीतर हवा की गति को कम कर देता है, इस वजह से प्रदूषित वायु घनी आबादी वाले क्षेत्रों से बाहर नहीं जा पाती हैं ।
  • अंटार्कटिक दोलन ने उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में तेज हवाएं पैदा कीं, जिससे प्रदूषण के स्तर पर असमान प्रभाव पड़ा।

महत्व :

  • शोधकर्ताओं ने जो मॉडल विकसित किया है, वह प्रदूषण के स्तर की भविष्यवाणी करने में 75% सटीकता दिखाता है और भविष्यवाणी एक सीजन पहले भी की जा सकती है।
  • भारत दुनिया के सबसे प्रदूषित देशों में से एक के रूप में उभर रहा है, पिछले साल दिल्ली के कुछ हिस्सों में पीएम 5 का स्तर 999 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से अधिक था।
  • शरद ऋतु (सितंबर-नवंबर) के दौरान समुद्र की सतह के तापमान में अल नीनो, अंटार्कटिक दोलन और विसंगतियों के संयोजन का अध्ययन सर्दियों (दिसंबर-फरवरी) में प्रदूषण की स्थिति का अनुमान लगाने में मदद कर सकता है।
  • शोधकर्ताओं द्वारा विकसित सांख्यिकीय मॉडल सर्दियों के आने से पहले प्रदूषण नियंत्रण के लिए नीतियों और रणनीतियों को समायोजित करने में सरकार की मदद कर सकता है ।

अंटार्कटिक दोलन क्या है ?

  • अंटार्कटिक दोलन (AAO) दक्षिणी गोलार्ध में वायुमंडलीय परिवर्तनशीलता का एक कम आवृत्ति वाला प्रारूप है।
  • इसे सदर्न एन्युलर मोड (एसएएम) के नाम से भी जाना जाता है।
  • इसे अंटार्कटिका के आसपास की तेज़ हवाओं या निम्न दबाव की एक पट्टी के रूप में परिभाषित किया गया है जो उत्तर या दक्षिण में परिवर्तनशील होती रहती है।
  • अपने सकारात्मक चरण में, पछुआ पवनें की पट्टी अंटार्कटिका की ओर सिकुड़ जाती है, जबकि इसके नकारात्मक चरण में यह बेल्ट भूमध्य रेखा की ओर बढ़ती है।

प्रभाव:  

दक्षिणी एन्यूलर मोड(SAN) से जुड़ी हवाएं अंटार्कटिक महाद्वीपीय शेल्फ के साथ गर्म पानी के प्रवाह के कारण गहरे पानी के अपसरण का कारण बनती हैं, जिससे आइस शेल्फ पिघल जाती है, इससे अंटार्कटिक आइस शीट का बड़ा हिस्सा नष्ट हो रहा है।