29 July 2019 Current affairs


# हाइपरबोला -1 #


संदर्भ:  

एक चीनी स्टार्टअप, आईस्पेस, ने चीन का पहला वाणिज्यिक रॉकेट- हाइपरबोला -1, पृथ्वी की कक्षा में लॉन्च किया है।

  • हाइपरबोला -1, CAS-7B क्यूबसैट (माइक्रोसेटेलाइट) ले जा रहा है। यह एक व्यावसायिक रेडियो मिशन है जिसे बीजिंग इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी द्वारा विकसित किया गया है।
  • हाइपरबोला -1, एयरोस्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी स्पेस इंजीनियरिंग डेवलपमेंट कंपनी लिमिटेड के लिए एक उपग्रह भी ले जा रहा है।

हाइपरबोला -1 के बारे में:

  • यह लगभग 68,000 पाउंड (31 मीट्रिक टन) वजनी है, जिसमें शुरूआती तीन चरणों में ठोस प्रणोदक, और एक अंतिम-कक्षीय इंजेक्शन के लिए तरल-ईंधन प्रयुक्त प्रयुक्त होता है।
  • यह रॉकेट 573 पाउंड (260 किलोग्राम) तक के द्रव्यमान वाले पैलोड को 310-मील-हाई (500-किलोमीटर) सूर्य-तुल्यकालिक ध्रुवीय कक्षा तक पहुंचाने में सक्षम है।

निहितार्थ :

इससे अन्तरिक्ष जैसे क्षेत्रो को निजी क्षेत्र के लिए खोलना संभव हो सकेगा। व्यावसायिक कार्यो के लिए अन्तरिक्ष का प्रयोग अन्तरिक्ष की क्षमता को अधिक गहनता के साथ मानव उपयोग से जोड़ देगा।

अमेरिका में निजी क्षेत्र, अन्तरिक्ष गतिविधियों में अग्र-सक्रिय भागीदारी रखता है। अब चीन के उदाहरण के बाद भारत में भी निजी क्षेत्र की इस कार्य में रूचि बढ़ेगी।



# कंपनी अधिनियम (संशोधन) विधेयक #


संदर्भ :

सरकार ने लोकसभा में कंपनी अधिनियम में संशोधन के लिए एक विधेयक पेश किया है। यह कंपनी अधिनियम, 2013 में संशोधन करता है।

आवश्यकता :

संशोधनों का उद्देश्य कॉर्पोरेट प्रशासन के नियमों को मजबूत करना और कॉर्पोरेट क्षेत्र में अनुपालन प्रबंधन को मजबूत करने के लिए अधिक जवाबदेही और बेहतर प्रवर्तन सुनिश्चित करना है।

कंपनियों की प्रमुख विशेषताएं (संशोधन) विधेयक, 2019 :

  • यह विधेयक कंपनियों को अपने अप्रयुक्त सीएसआर फंड को एक अलग खाते में स्थानांतरित करने की अनुमति देता है और उस को तीन वित्तीय वर्षों के भीतर खर्च करना पड़ेगा। यदि धन अप्रयुक्त रह जाता हैं तो इसे अधिनियम की अनुसूची सातवीं में निर्दिष्ट किसी भी निधि में स्थानांतरित किया किया जायेगा।
  • यह विशेष अदालतों से बोझ को कम करने और उल्लंघन करने वालों के लिए केंद्र सरकार को अधिक शक्ति प्रदान करता है।
  • विधेयक राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग प्राधिकरण (NFRA) को डिवीजनों और कार्यकारी निकाय के माध्यम से अपने कार्य करने में अधिक सक्षम बनाना चाहता है।
  • यदि कंपनी अधिनियम के अनुसार व्यावसायिक गतिविधियां नहीं कर रही है, तो कंपनी के नाम को हटाने के लिए रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज (आरओसी) को सशक्त बनाने के लिए इसमे प्रावधान किया गया है।
  • एनसीएलटी से कुछ कार्यों को लेकर केंद्र सरकार को हस्तांतरित करने का प्रस्ताव है जैसे कि – वित्तीय वर्ष में परिवर्तन और सार्वजनिक से निजी क्षेत्र में रूपांतरण के लिए कंपनियों द्वारा आवेदन।
  • शेल कंपनियों से उत्पन्न खतरे को रोकने के लिए, बिल में पंजीकृत कार्यालय का रखरखाव न करने और कंपनियों के रजिस्टर से कंपनी का नाम हटाने के लिए प्रक्रिया शुरू करने की गैर-रिपोर्टिंग करने का प्रस्ताव है।


# POCSO कोर्ट #


संदर्भ :  

उच्चतम न्यायालय ने केंद्र को देश भर में प्रत्येक जिले में विशेष अदालतें स्थापित करने का निर्देश दिया है,  जहाँ पर बाल यौन शोषण और यौन उत्पीड़न से संरक्षण अधिनियम (POCSO) अधिनियम  के तहत 100 से अधिक मामले लंबित हैं।

विशेष अदालतों की आवश्यकता:

  • वर्तमान में यौन उत्पीडनों से बच्चों के संरक्षण पर कार्रवाई की गति धीमी हैं । उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पॉक्सो के तहत पीड़ितों की संख्या 2015 में 3%, 2016 में 4% और 2017 में 5% थी। 670 नामित अदालतों के समक्ष लगभग 1.5 लाख मुकदमे लंबित हैं।
  • यद्यपि अधिनियम एक वर्ष में ट्रायल पूरा करने का आदेश देता है, लेकिन निर्धारित समयसीमा को प्राप्त करना असंभव है क्योंकि प्रत्येक नामित न्यायाधीश ट्रायल के अलावा अन्य मामलों की सुनवाई के मामलों में भी व्यस्त है।

विशेष अदालतों की स्थापना के लिए सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश:

  • ऐसी अदालतों को केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित किया जाएगा। राजकीय निधि न केवल पीठासीन अधिकारी की नियुक्ति का समर्थन करेगी, बल्कि सहायक व्यक्तियों, विशेष सरकारी अभियोजकों, अदालत के कर्मचारियों की नियुक्ति और बुनियादी ढांचे का निर्माण भी करेगी, जिसमें बाल अनुकूल अदालत के कमरे का निर्माण भी शामिल है।
  • जागरूकता: डब्लूसीडी मंत्रालय “छोटे क्लिप के माध्यम से स्क्रीनिंग करने की सुविधा देगा जिनको हर फिल्म हॉल में और नियमित अंतराल पर विभिन्न टेलीविजन चैनलों द्वारा प्रसारित किया जा सकता है। जिसका उद्देश्य सामान्य रूप से विषय के बारे में जागरूकता फैलाना होगा ताकि बाल शोषण और बच्चों के खिलाफ अपराधों को रोका जा सके ।
  • स्कूलों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर एक चाइल्ड हेल्पलाइन नंबर भी प्रदर्शित किया जाना चाहिए।

पृष्ठभूमि:

केरल में सबसे खराब जज-केस अनुपात (judge-case ratio) है क्योंकि इस राज्य में 14 जिलों के लिए सिर्फ 3 अदालतों की स्थापना की गई है जिनमें से प्रत्येक अदालत में 2,211 मामले निपटाने के लिए रखे हुए हैं।

छत्तीसगढ़ और पंजाब में प्रति कोर्ट औसत 51 मामले हैं।

प्रस्तावित हालिया संशोधन:

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012 में संशोधन को मंजूरी दे दी है।

प्रस्तावित प्रमुख परिवर्तन:

  • इसमें बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के मामलों में मौत की सजा का प्रावधान शामिल है।
  • संशोधनों में बाल पोर्नोग्राफी पर अंकुश लगाने के लिए जुर्माना और कारावास की सजा का प्रावधान है।
  • संशोधन में कई नये क्षेत्रो को भी शामिल किया गया हैं – प्राकृतिक आपदाओं के समय बच्चों को यौन अपराधों से बचाने और अन्य स्थितियों में जहां बच्चों को किसी भी तरह से, किसी भी हार्मोन या किसी भी रासायनिक पदार्थ से यौन उत्पीड़न के उद्देश्य के लिए यौन परिपक्वता बढ़ाने वाले कार्यों को भी दण्डात्मक बनाया गया है।


# राज्य द्वारा चुनावों का वित्तपोषण #


संदर्भ:  

शराबबंदी के साथ चुनाव खर्च पर खर्च की सीमा की तुलना करते हुए, कांग्रेस सांसद राजीव गौड़ा ने एक निजी विधेयक राज्यसभा में पेश किया हैं – जन प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक, जो भारत में चुनाव सुधार के रूप में चुनाव में व्यव सीमा को हटाने और राज्य द्वारा चुनावो के वित्तपोषण शुरू करने का प्रावधान करता है।

व्यय सीमा क्यों हटाई जाए ?

व्यय पर सीमा को काउंटर उत्पादक के रूप में देखा जाता है जो केवल काले धन वाले लोगों द्वारा व्यक्तिगत मतदाताओं को रिश्वत देने और ईमानदार उम्मीदवारों को अपंग बनाने में मदद करता है।

बिल में किए गए प्रस्ताव :

  • एक सीमा लगाने के बजाय पारदर्शिता लाई जानी चाहिए। उम्मीदवारों को कानूनी रूप से धन जुटाने की अनुमति दी जानी चाहिए।
  • बिल ने एक राष्ट्रीय चुनाव निधि का प्रस्ताव किया है, जिसके तहत प्रत्येक राजनीतिक दल को उनके हालिया चुनावी प्रदर्शन के अनुसार धन आवंटित किया जा सकता है।

राज्य द्वारा चुनावों का वित्तपोषण क्या है?

इसका मतलब है कि सरकार राजनीतिक दलों या उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने के लिए धन देती है।

इसका मुख्य उद्देश्य उम्मीदवारों के लिए शक्तिशाली लोगो से पैसा लेने की आवश्यकता को समाप्त करना हैं ताकि उनकी शुचिता को बनाये रखा जा सकें।

सार्वजनिक धन क्यों अच्छा है?

  • राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को अपने चुनावी अभियानों के लिए, अपने निर्वाचन क्षेत्रों के साथ संपर्क रखने, नीतिगत निर्णय लेने और पेशेवर कर्मचारियों को भुगतान करने के लिए धन की आवश्यकता होती है। इसलिए सार्वजनिक धन लोकतंत्र की एक स्वाभाविक और आवश्यक लागत है।
  • सार्वजनिक धनराशि बाहरी प्रभावशाली हितो के प्रभाव को सीमित कर सकती है और इससे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी।
  • सार्वजनिक धन से पार्टी और उम्मीदवार के वित्त में पारदर्शिता बढ़ सकती है और इससे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी।
  • जिन समाजों में बहुत से नागरिक गरीबी रेखा के नीचे या उससे ऊपर हैं, वहां पर राजनीतिक दलों या उम्मीदवारों को बड़ी मात्रा में धनराशि प्रदान करने की उम्मीद नहीं की जा सकती है।
  • यदि पार्टियों और उम्मीदवारों को राज्य से कम से कम एक बुनियादी मूल धन भी प्राप्त होता है, तो देश में लोगों को अपने दुर्लभ संसाधनों को छोड़े बिना कार्यशील बहु-पार्टी प्रणाली को बढ़ावा दिया जा सकता है।

कुछ लोग इस विचार के विरोधी क्यों हैं?

  • घाटे की बजट के साथ जूझ रही सरकार राजनीतिक दलों को चुनाव लड़ने के लिए पैसे कैसे दे सकती है।
  • राज्य का धन हर दूसरे संगठन को राजनीतिक क्षेत्र में आने के लिए प्रोत्साहित करेगा।
  • इसके अलावा, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा जैसे प्रमुख सामाजिक क्षेत्रों पर राज्य का व्यय “अत्यल्प” है ।
  • चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक दलों को पैसा देने का विचार विद्रोह की आशंका युक्त है।

सार्वजनिक धन के लिए जाना मुश्किल क्यों है?

  • एक चुनाव में राजनीतिक दल अपने पार्टी उम्मीदवारों को जो धनराशि देता है, वह एक उम्मीदवार से दूसरे उम्मीदवार में भिन्न होता है और इस संबंध में राजनीतिक दलों के भीतर ही बहुत भिन्नता होती है।
  • मान लेते है कि एक निर्वाचन क्षेत्र में पांच उम्मीदवार हैं और भले ही उनमें से हर कोई समान खर्च नहीं करता है, लेकिन प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में लगभग 15 करोड़ की राशि खर्च की जाएगी, जो 4,215 क्षेत्रो के साथ पुरे भारत में लगभग 13,000 करोड़ का अनुमानित खर्च होगा ।
  • जबकि एक लोकसभा उम्मीदवार के खर्च करने की अधिकतम कानूनी सीमा 70 लाख है, लेकिन एक विजयी उम्मीदवार अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए औसतन 10 करोड़ से कम खर्च नहीं करता है। मान लीजिए कि प्रति निर्वाचन क्षेत्र में औसतन पाँच उम्मीदवार हैं, और हारने वालों की राशि को कम मान भी लिया जाए तो प्रत्येक लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में लगभग 30 करोड़ खर्च किए जाएंगे और लोकसभा के 543 सदस्यों को प्रतिवर्ष लगभग 3,300 करोड़ दिए जाएंगे।
  • इसके बाद केंद्र और कुछ राज्यों और स्थानीय शासी निकायों में उच्च सदनों के चुनाव होते हैं। इसलिए यह तर्क दिया जाता है कि सार्वजनिक धन का इस तरह का प्रयोग सरकारी खजाने पर अनावश्यक और अत्याधिक बोझ डालने वाला सिद्ध होगा।