10 August 2019 The Hindu Editorial


# कुलभूषण जाधव मामले में निहित चुनौतियाँ #


The Hindu, 10 August 2019

17 जुलाई, 2019 को कुलभूषण जाधव मामले में इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस के फैसले को भारत और पाकिस्तान दोनों ने अपनी जीत के रूप में दिखाया । हालाँकि सच्चाई दोनों देशों के दावों के बीच कुछ और थी । इस फैसले में कहा गया कि पाकिस्तान ने वियना कन्वेंशन ऑन कांसुलर रिलेशंस (VCCR) के कई प्रावधानों का उल्लंघन किया है। पाकिस्तान ने संधि के अनुच्छेद 36 के तहत श्री जाधव को अपने अधिकारों के बारे में सूचित करने में विफल रहने के अलावा भारत को भी  सूचित करने की आवश्यकता नहीं समझी। इस प्रकार पाकिस्तान उसे कांसुलर पहुंच देने में भी विफल रहा । बहरहाल, ICJ ने दो महत्वपूर्ण आधारों पर भारत के दावों को महत्व दिया – निष्पक्ष परीक्षण अधिकार (Trial Rights) और उपचार (Remedy)।

पृष्ठभूमि :

भारत का मामला सिविल एंड पॉलिटिकल राइट्स (ICCPR) पर अंतर्राष्ट्रीय करार के अनुच्छेद 14 पर टिका है, जो व्यक्तियों को निष्पक्ष परीक्षण के अधिकार की गारंटी देता है। श्री जाधव को एक सैन्य न्यायाधिकरण के माध्यम से दोषी ठहराने, अपमानजनक परिस्थितियों में कबूलनामे के वीडियो को साक्ष्य के रूप में उपयोग करने और भारतीय कांसुलर अधिकारियों को उसके लिए कानूनी प्रतिनिधित्व की व्यवस्था करने का मौका न देने, जैसे तर्क देकर भारत में स्पष्ट कहा कि पाकिस्तान ने जाधव का न्यायिक परीक्षण एक अन्यायपूर्ण प्रक्रिया के तहत किया था।

हालांकि, ICJ ने VCCR के वैकल्पिक प्रोटोकॉल के अनुच्छेद 1 के तहत इस मामले में अपने अधिकार क्षेत्र का चयन किया, जो कि ICJ के अनिवार्य क्षेत्राधिकार को केवल कांसुलर कन्वेंशन की व्याख्या से उत्पन्न विवादों पर न्याय-निर्णयन देता है। परिणाम यह हुआ कि ICCPR के तहत मानवाधिकारों के दायित्वों जैसे अन्य मानदंडों के उल्लंघन से संबंधित विवादों को ICJ ने अधिकार क्षेत्र से बाहर कर दिया । हालाँकि वीसीसीआर पर ICCPR को प्राथमिकता दिलाने के भारत के प्रयास एक प्रभावी उपचार सुनिश्चित कराने में सहायक होंगे।

उपचार जारी करना :

ICJ के निर्णय का सबसे अधिक परेशान करने वाला पहलू उपचारों को लेकर है। इसने रिहाई के लिए भारत की प्रार्थना को खारिज कर दिया। इसके बजाय, इसने फैसला दिया कि सजा की “प्रभावी समीक्षा और पुनर्विचार” करने के लिए पाकिस्तान को कार्य करना होगा। इसका सरल अर्थ यह है कि पाकिस्तान जाधव को एक न्यायिक तंत्र प्रदान करेगा, जो कांसुलर पहुँच प्राप्त करने के बाद उसकी सजा और दोष पर पुनर्विचार करने (संभवतः परिवर्तन) के लिए उसे एक न्यायिक तंत्र प्रदान करेगा।

यह निर्णय निम्न कारणों से चिंताजनक है –

  • न्यायिक उपचारों का इतिहास सही नहीं रहा है । सम्बन्धित देशों द्वारा कमजोर समीक्षा तंत्र के कारण इन उपायों का क्रियान्वयन संतोषजनक नहीं रहा है ।
  • जाधव के निष्पक्ष परीक्षण अधिकारों के उल्लंघन के लिए उपचार बहुत कम है। इसका मतलब यह है कि पाकिस्तान की समीक्षा प्रक्रिया एक सैन्य न्यायाधिकरण के माध्यम से की जा सकती है, जो कि वीडियो स्वीकारोक्ति पर आधारित होने के कारण आंतरिक रूप से अस्पष्ट है।

जाधव की सजा की समीक्षा और पुनर्विचार करने के अलावा, ICJ ने इसके क्रियान्वयन के तरीकों को तलाशने पर भी थोड़ा कार्य किया है । एवेना फैसले के अनुसार, जाधव को एक क्षमादान याचिका तक पहुँच प्रदान करना समीक्षा का एक अपर्याप्त रूप है, क्योंकि यहाँ न्यायिक तंत्र के उपयोग की आवश्यकता नहीं पड़ती है। पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने ज़मान खान बनाम पाकिस्तान फेडरेशन मामले में फैसला सुनाया है कि राज्य की नागरिक अदालतें, सैन्य न्यायाधिकरण के केवल उन निर्णयों की समीक्षा कर सकती है जो कि संकीर्ण आधार (यानी क्षेत्राधिकार के अभाव या दुर्भावना) पर सुनाये गये हैं । इसलिए यह संभावना नहीं है कि जाधव को वीसीसीआर अधिकारों से वंचित करने को भी इसी श्रेणी में माना जाए। हालांकि, अब्दुर रशीद मामले में पेशावर उच्च न्यायालय के 2018 के निर्णय में इसे व्यापक बनाने के लिए ज़मान खान के फैसले की समीक्षा की जा रही है।

फिर से ICJ में वापसी :

अगर अब्दुर रशीद के मामले में फैसला पाकिस्तान के सैन्य न्यायाधिकरणों के निर्णयों के लिए अधिक प्रभावी समीक्षा तंत्र प्रदान करने में असमर्थ रहता है तो क्या पाकिस्तान आईसीजे के आदेश के मुताबिक कानून में संशोधन करने की हिम्मत करेगा, यह देखने की जरूरत होगी, क्योंकि आईसीजे द्वारा कहा गया था कि “पाकिस्तान प्रभावी उपचार सुनिश्चित करने के लिए सजा की समीक्षा और पुनर्विचार हेतु सभी संभव उपाय करेगा।, यदि आवश्यक हो तो उचित कानून लागू करके भी ऐसा करेगा”।

जाधव का निर्णय भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए एक कड़वी दवा है ।

  • पाकिस्तान के लिए, अपनी कानूनी प्रणाली में एक महत्वपूर्ण फेरबदल करने से यह सन्देश जाएगा कि ICJ का निर्णय पाकिस्तान की न्यायिक समीक्षा तंत्र को पलटने की बात करता था । इसलिए इसका पाकिस्तान द्वारा स्वागत करने की संभावना भी न्यूनतम है।
  • भारत के लिए, जाधव को बरी कराने में विफल रहने पर खुद की कानूनी प्रक्रियाओं को उचित ठहराने की जिम्मेदारी होगी और पाकिस्तान इस दशा में अपने कानूनी सुदृढ़ता का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने का प्रयास करेगा।

निष्कर्ष :

दोनों देशों ने आईसीजे के फैसले का पूरी तरह से राजनीतिकरण करके खुद को मुसीबत में डाल लिया है। ऐसा लग रहा है कि पाकिस्तान में जो भी कानूनी प्रक्रिया हो, दोनों देश जल्द ही अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का दरवाजा खटखटाने फिर वापस आ जाएंगे। इसके संकेत मिल रहे हैं। जिसमें पाकिस्तान ने आईसीजे के फैसले के बाद जारी एक अधिसूचना में जाधव तक राजनयिक पहुंच से इनकार कर दिया। भारत के वकील हरीश साल्वे ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि अगर पाकिस्तान का आचरण असंतोषजनक रहता है तो भारत आईसीजे में लौटने में संकोच नहीं करेगा। हालांकि, अब गेंद पाकिस्तान के पाले में गई हुई है।



# स्पेशल रिपोर्ट ऑन क्लाइमेट चेंज एंड लैंड #


आलेख: द इंडियन एक्सप्रेस

09 अगस्त को इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (Intergovernmental Panel on Climate Change ,IPCC) द्वारा  जारी एक रिपोर्ट (Special Report on Climate Change and Land) में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए दुनिया के खेतों और जंगलों का बेहतर प्रबंधन आवश्यक है। विदित है कि भूमि उपयोग हमेशा से  जलवायु परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में एक अहम हिस्सा रहा है, ठीक इसी प्रकार वनीकरण जैसी गतिविधियों का  ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ लड़ाई में एक महत्वपूर्ण  स्थान है। आईपीसीसी की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि स्वच्छ ऊर्जा और स्वच्छ परिवहन अकेले वैश्विक उत्सर्जन में कटौती नहीं कर सकेंगे। रिपोर्ट के अनुसार,  वैश्विक खाद्य प्रणाली दुनिया के जीएचजी (Green house Gas) उत्सर्जन के 21 से 37 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार है।

कृषि भूमि क्षेत्र का लगभग एक चौथाई भाग उसके अधीन है, जिसे रिपोर्ट में  “मानव-प्रेरित गिरावट”(human-induced degradation) के रूप में वर्णित किया गया है। तेजी से कृषि विस्तार के कारण जंगलों, आर्द्रभूमि और घास के मैदान तथा अन्य पारिस्थितिकी तंत्र नष्ट हो गए हैं। कृषि क्षेत्रों से मिट्टी का क्षरण हो रहा है । रिपोर्ट का अनुमान है कि मिट्टी के क्षरण की दर से 10 से 100 गुना अधिक है। इसने उपोत्पाद प्रभाव पैदा किया है। उल्लेखनीय है कि जब भूमि का ह्रास होता है, तो इसकी उत्पादकता कम हो जाती है और कार्बन को अवशोषित करने के लिए मिट्टी की क्षमता को कम करती है। यह जलवायु परिवर्तन को बढ़ाता है । इसके अलावा, पशुपालन जैसी कृषि और संबद्ध गतिविधियां मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड के प्रमुख स्रोत हैं जो कि कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कहीं अधिक खतरनाक है ।

आगामी जलवायु वार्ताओं में इस रिपोर्ट पर महत्वपूर्ण चर्चा होने की उम्मीद है । उल्लेखनीय है कि सितंबर माह  में “UN Convention to Combat Desertification” का आयोजन दिल्ली में होगा, जबकि दिसंबर माह में “UN Framework Convention on Climate Change Conference (COP25)” का आयोजन  सैंटियागो, चिली में होगा । यह  रिपोर्ट भारत जैसे विकासशील देशों पर दबाव डाल सकती है ताकि वे अपने ग्लोबल वार्मिंग को कम करने  के  लक्ष्यों को पूरा कर सके। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत, लुइस अल्फोंसो डी अल्बा ने कथित तौर कहा  है कि भारत कृषि जैसे क्षेत्रों सहित जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देगा। लेकिन जो देश अपने पेरिस जलवायु संधि के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए निश्चित रूप से तैयार हैं, उन्हें अपने कृषि क्षेत्रों के लिए प्रतिबद्धताओं को ध्यान में रखना चाहिए। हालाँकि, भारत  और अन्य देश अपने  ज्ञान प्रणालियों में सुधार करके भूमि क्षरण और मिट्टी के कटाव पर अंकुश लगाने का प्रयास कर सकते हैं ।

पी.टी फैक्ट: जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (Intergovernmental Panel on Climate Change ,IPCC) अंतर-सरकारी वैज्ञानिक निकाय है।यह संयुक्त राष्ट्र संघ का आधिकारिक पैनल है जो जलवायु में बदलाव और ग्रीनहाउस गैसों का ध्यान रखता है। इस संस्था को 2007 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।